{"schemaVersion":1,"totalVerseCount":701,"languages":["en","hi"],"chapters":[{"number":1,"sanskritName":"अर्जुनविषादयोग","englishName":"Arjuna Visada Yoga","summaryEn":"Arjuna surveys both armies and sees teachers, relatives, and friends on each side. Overcome by grief and moral uncertainty, he lowers his bow and asks Krishna for guidance.","summaryHi":"भगवद गीता का पहला अध्याय अर्जुन विशाद योग उन पात्रों और परिस्थितियों का परिचय कराता है जिनके कारण पांडवों और कौरवों के बीच महाभारत का महासंग्राम हुआ। यह अध्याय उन कारणों का वर्णन करता है जिनके कारण भगवद गीता का ईश्वरावेश हुआ। जब महाबली योद्धा अर्जुन दोनों पक्षों पर युद्ध के लिए तैयार खड़े योद्धाओं को देखते हैं तो वह अपने ही रिश्तेदारों एवं मित्रों को खोने के डर तथा फलस्वरूप पापों के कारण दुखी और उदास हो जाते हैं। इसलिए वह श्री कृष्ण को पूरी तरह से आत्मसमर्पण करते हैं। इस प्रकार, भगवद गीता के ज्ञान का प्रकाश होता है।","verseCount":47,"artwork":"assets/chapters/chapter_01.jpg"},{"number":2,"sanskritName":"सांख्ययोग","englishName":"Sankhya Yoga","summaryEn":"Krishna begins his response by distinguishing the enduring self from the changing body. He introduces disciplined action, freedom from attachment to results, and the qualities of a steady mind.","summaryHi":"भगवद गीता का दूसरा अध्याय सांख्य योग है। यह अध्याय भगवद गीता का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है क्योंकि इसमें भगवान श्रीकृष्ण संपूर्ण गीता की शिक्षाओं को संघनित करते हैं। यह अध्याय पूरी गीता का सार है।\nसांख्य योग को 4 मुख्य विषयों में वर्गीकृत किया जा सकता है - \n१. अर्जुन ने पूरी तरह से भगवान कृष्ण को आत्मसमर्पण किया और उन्हें अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया।\n२. सभी दु:खों के मुख्य कारणों की व्याख्या, जो स्व की वास्तविक प्रकृति की अज्ञानता है।\n३. कर्मयोग - अपने कर्मों के फलों से जुड़े बिना नि:स्वार्थ क्रिया का अनुशासन।\n४. एक परिपूर्ण मनुष्य का विवरण - जिसका मस्तिष्क स्थिर और एक-इशारा है।","verseCount":72,"artwork":"assets/chapters/chapter_02.jpg"},{"number":3,"sanskritName":"कर्मयोग","englishName":"Karma Yoga","summaryEn":"Krishna explains why action cannot be avoided and how it can become a path to freedom. The focus is on fulfilling one’s responsibilities without clinging to personal reward.","summaryHi":"भगवद गीता का तीसरा अध्याय कर्मयोग या निःस्वार्थ सेवा का मार्ग है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण जीवन में कर्म के महत्व पर जोर देते हैं। वे बताते हैं कि इस भौतिक संसार में हर मनुष्य का किसी न किसी प्रकार की क्रिया में सम्मिलित होना अनिवार्य है। इसके अलावा, वह उन कार्यों के बारे में बताते हैं जो मनुष्य को बांधते हैं अथवा वे जो मनुष्य को मुक्ति दिलाते हैं। वे मनुष्य जो अपने कर्तव्यों को भगवन की ख़ुशी के लिए एवं बिना फल की अपेक्षा किये हुए निरंतर करते रहते हैं, वे अंत में मुक्ति प्राप्त करते हैं।","verseCount":43,"artwork":"assets/chapters/chapter_03.jpg"},{"number":4,"sanskritName":"ज्ञानकर्मसंन्यासयोग","englishName":"Jnana Karma Sanyasa Yoga","summaryEn":"Krishna connects wise action with spiritual knowledge and explains why he appears whenever dharma declines. Knowledge clarifies the nature of action and releases it from binding attachment.","summaryHi":"भगवद गीता का चौथा अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग योग है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण कर्मयोग का गुणगान करते हैं अथवा अर्जुन को आत्मा एवं परम सत्य का बोध कराते हैं। वे भौतिक संसार में अपनी उपस्तिथि के पीछे कारण का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि भले ही वह अनन्त हैं, फिर भी वह इस धरती पर धर्म और शांति को पुन: स्थापित करने के लिए समय समय पर जन्म लेते रहते हैं। उनके जन्म और क्रियाकलाप शाश्वत हैं और सामूहिक दोषों से कभी भी दूषित नहीं होते हैं। वे मनुष्य जो इस सत्य को जानते और समझते हैं, वे संपूर्ण श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति करते हैं और अंततः उन्हें प्राप्त करते हैं। उनहे इस दुनिया में फिर से जन्म लेने की जरूरत नहीं है।","verseCount":42,"artwork":"assets/chapters/chapter_04.jpg"},{"number":5,"sanskritName":"कर्मसंन्यासयोग","englishName":"Karma Sanyasa Yoga","summaryEn":"Arjuna asks whether renunciation or disciplined action is the better path. Krishna shows how acting without possession, ego, or attachment can bring the freedom often associated with withdrawal.","summaryHi":"भगवद गीता का पांचवा अध्याय कर्मसन्यासयोग योग है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने कर्मयोग और कर्मसन्यासयोग कि तुलना करते हुआ यह बतलाया है कि यह दोनों मार्ग एक ही लक्ष्य तक पहुँचने के माध्यम हैं। इसलिए हम इनमें से किसी भी मार्ग का चुनाव कर सकते हैं। एक बुद्धिमान व्यक्ति को अपने कर्मों को भगवान को समर्पित करते हुए अथवा उनके फल कि चिंता करे बिना अपने सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए। इस तरह वे पाप से अप्रभावित रहते हैं और अंततः मुक्ति प्राप्त करते हैं।","verseCount":29,"artwork":"assets/chapters/chapter_05.jpg"},{"number":6,"sanskritName":"ध्यानयोग","englishName":"Dhyana Yoga","summaryEn":"Krishna gives practical guidance on meditation: posture, attention, moderation, and repeated practice. He also addresses the restless mind and the fear of failing on the path.","summaryHi":"भगवद गीता का छठा अध्याय ध्यान योग है। इस अध्याय में कृष्ण बताते हैं कि हम किस प्रकार ध्यान योग का अभ्यास कर सकते हैं। वे ध्यान की तैयारी में कर्म की भूमिका पर चर्चा करते हैं अथवा बताते हैं कि किस प्रकार भक्ति में किया गए कर्म मनुष्ये के मन को शुद्ध करते हैं और उसकी आध्यात्मिक चेतना की वृद्धि में सहायता करते हैं। वे उन बाधाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं जो कि मनुष्य को अपने दिमाग को नियंत्रित करते समय झेलनी पड़ती हैं अथवा उन सटीक तरीकों का वर्णन करते हैं जिनसे एक मनुष्य अपने दिमाग को जीत सकता है। उन्होंने प्रकट किया की हम किस प्रकार परमात्मा पर अपना ध्यान केंद्रित करके भगवान के साथ एक हो सकते हैं।","verseCount":47,"artwork":"assets/chapters/chapter_06.jpg"},{"number":7,"sanskritName":"ज्ञानविज्ञानयोग","englishName":"Gyaan Vigyana Yoga","summaryEn":"Krishna describes himself as the source and sustaining presence of the world. The chapter explores knowledge, realization, maya, and the different reasons people turn toward the divine.","summaryHi":"भगवद गीता का सातवा अध्याय ज्ञानविज्ञानयोग है। इस अध्याय में कृष्ण बताते हैं कि वह सर्वोच्च सत्य हैं एवं हर चीज़ के मुख्य कारण हैं। वे इस भौतिक संसार में अपनी भ्रामक ऊर्जा - योगमाया के बारे में बताते हैं अथवा प्रकट करते हैं कि इस ऊर्जा पर काबू पाना साधारण मनुष्य के लिए कितना कठिन है परन्तु जो मनुष्य अपने मन को परमात्मा में लीन कर लेते हैं वे इस माया को जीत लेते हैं और उन्हे आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। वे उन चार प्रकार के लोगों का भी वर्णन करते हैं जो भक्ति में लीन होकर उनको आत्मसमर्पण करते हैं अथवा वे चार प्रकार जो नहीं करते। कृष्ण पुष्टि करते हैं कि वे ही परम सत्य हैं। जो लोग इस सत्य को समझ लेते हैं, वे आध्यात्मिक प्राप्ति के शिखर पर पहुंच जाते हैं और भगवान को प्राप्त कर लेते हैं।","verseCount":30,"artwork":"assets/chapters/chapter_07.jpg"},{"number":8,"sanskritName":"अक्षरब्रह्मयोग","englishName":"Akshara Brahma Yoga","summaryEn":"Arjuna asks about Brahman, the self, action, and remembrance at death. Krishna answers by connecting one’s final attention with the habits of awareness cultivated throughout life.","summaryHi":"भगवद गीता का आठवां अध्याय अक्षरब्रह्मयोग है। इस अध्याय में, कृष्ण मृत्यु से पहले अंतिम विचार का महत्व बताते हैं। अगर हम मृत्यु के समय कृष्ण को याद कर लें तो हम निश्चित रूप से उन्हें प्राप्त करेंगे। इसलिए हर समय प्रभु के बारे में जागरूकता रखना, उनके बारे में सोचना और हर समय उनके नामों का जप करना बहुत महत्वपूर्ण है। अपने मन को पूरी तरह से कृष्ण की निरंतर भक्ति में समाहित करके हम इस भौतिक संसार से परे भगवान के सर्वोच्च निवास तक जा सकते हैं। ","verseCount":28,"artwork":"assets/chapters/chapter_08.jpg"},{"number":9,"sanskritName":"राजविद्याराजगुह्ययोग","englishName":"Raja Vidya Yoga","summaryEn":"Krishna presents a direct teaching on divine presence, creation, and wholehearted devotion. Even a simple offering has meaning when it is given with sincerity.","summaryHi":"भगवद गीता का नौवां अध्याय राजविद्याराजगुह्ययोग है। इस अध्याय में, कृष्ण समझाते हैं कि वह सर्वोच्च हैं और यह भौतिक संसार उनकी योगमाया द्वारा रचित और खंडित होता रहता है अथवा मनुष्य उनकी देखरेख में आते जाते रहते हैं। वे हमारी आध्यात्मिक जागरूकता के प्रति भक्ति की भूमिका और महत्व का वर्णन करते हैं। ऐसी भक्ति में मनुष्य को भगवन के लिए ही जीवित रहना चाहिए, अपना सर्वस्व भगवन को ही समर्पित करना चाहिए और सबकुछ भगवन के लिए ही करना चाहिए। जो इस प्रकार की भक्ति का अनुसरण करता है वह इस भौतिक संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है और भगवान के साथ एकजुट हो जाता है।","verseCount":34,"artwork":"assets/chapters/chapter_09.jpg"},{"number":10,"sanskritName":"विभूतियोग","englishName":"Vibhooti Yoga","summaryEn":"Krishna names the forms through which his presence may be recognized: whatever is radiant, powerful, beautiful, or sustaining. These examples give Arjuna a way to contemplate the divine in the world.","summaryHi":"भगवद गीता का दसवां अध्याय विभूतियोग है। इस अध्याय में, कृष्ण स्वयं को सभी कारणों के कारण बताते हैं। अर्जुन की भक्ति को बढ़ाने के लिए वे अपने विभिन्न अवतारों और प्रतिष्ठानों का वर्णन करते हैं। अर्जुन पूरी तरह से भगवान के सर्वोच्च पद से आश्वस्त हैं और उन्हें सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में घोषित करते हैं। वे कृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि वे अपनी अन्य दिव्य महिमाओं के बारेमे बताएं जो कि सुनने में अमृत सामान हैं।","verseCount":42,"artwork":"assets/chapters/chapter_10.jpg"},{"number":11,"sanskritName":"विश्वरूपदर्शनयोग","englishName":"Vishwaroopa Darshana Yoga","summaryEn":"Krishna grants Arjuna a vision of the universal form, containing creation, destruction, and time itself. Arjuna responds with awe and fear before asking to see Krishna’s familiar form again.","summaryHi":"भगवद गीता का ग्यारहवा अध्याय विश्वरूपदर्शनयोग है। इस अध्याय में, अर्जुन कृष्ण को अपने विश्व रूप को प्रकट करने का अनुरोध करते हैं जो की सारे विश्वों अथवा संपूर्ण अस्तित्व का स्त्रोत है। भगवान कृष्ण के शरीर में पूरी सृष्टि को देखने में सक्षम होने के लिए अर्जुन को दिव्य दृष्टि दी जाती है।","verseCount":55,"artwork":"assets/chapters/chapter_11.jpg"},{"number":12,"sanskritName":"भक्तियोग","englishName":"Bhakti Yoga","summaryEn":"Arjuna asks about devotion to a personal form and contemplation of the formless. Krishna explains both approaches and describes the qualities of a devoted person.","summaryHi":"भगवद गीता का बारहवां अध्याय भक्तियोग है। इस अध्याय में, कृष्ण भक्ति योग की श्रेष्ठता पर बल देते हैं और भक्ति के विभिन्न पहलुओं का वर्णन करते हैं। वे आगे बताते हैं कि वे भक्त जो अपने सभी कर्म उनको समर्पित करके, अपनी चेतना उनमें विलीन करके, सच्चे मन से उनकी भक्ति करते हैं वे बहुत जल्दी जीवन और मृत्यु के चक्र से मुक्ति पा लेते हैं। वे अपने सबसे प्रिय भक्तों के विभिन्न गुड़ों का भी वर्णन करते हैं।","verseCount":20,"artwork":"assets/chapters/chapter_12.jpg"},{"number":13,"sanskritName":"क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग","englishName":"Ksetra Ksetrajna Vibhaaga Yoga","summaryEn":"The body is described as the field, and awareness as the knower of the field. Krishna distinguishes matter, consciousness, knowledge, and the presence that knows experience.","summaryHi":"भगवद गीता का तेरवाह अध्याय क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग है। क्षेत्र शब्द का मतलब भूमि और क्षेत्ररक्षण का मतलब क्षेत्र का जानकार है। हमारा भौतिक शरीर क्षेत्र के सामान है और हमारी अमर आत्मा क्षेत्र के जानकार के सामान है। इस अध्याय में, कृष्ण भौतिक शरीर और अमर आत्मा के बीच भेद करते हैं। वह बताते हैं कि भौतिक शरीर अस्थायी और विनाशकारी है जबकि आत्मा स्थायी और शाश्वत है। भौतिक शरीर नष्ट हो सकता है लेकिन आत्मा कभी भी नष्ट नहीं हो सकती। यह अध्याय फिर भगवान का वर्णन करता है, जो की सर्वोच्च आत्मा हैं। सभी व्यक्तिगत आत्माएं सर्वोच्च आत्मा से उत्पन्न हुई हैं। जो स्पष्ट रूप से शरीर, आत्मा और सर्वोच्च आत्मा के बीच अंतर को समझ लेता है वह परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।","verseCount":35,"artwork":"assets/chapters/chapter_13.jpg"},{"number":14,"sanskritName":"गुणत्रयविभागयोग","englishName":"Gunatraya Vibhaga Yoga","summaryEn":"Krishna explains sattva, rajas, and tamas—the three qualities that shape perception and action. He describes how to recognize their influence and move beyond their hold.","summaryHi":"भगवद गीता का चौदहवा अध्याय गुणत्रयविभागयोग है। इस अध्याय में, कृष्ण भौतिक प्रकृति के तीन गुणों का वर्णन करते हैं जिनसे भौतिक संसार में सब कुछ प्रभावित होता है - अच्छाई, लालसा और अज्ञान। आगे वह इन तीनों गुणों के प्रधान अभिलक्षणों अथवा कारणों का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि कैसे ये तीनों गुण मनुष्य को प्रभावित करते हैं। फिर वह ऐसे व्यक्तियों की विभिन्न विशेषताओं का वर्णन करते हैं जो कि इन गुणों पर जीत पा चुके हैं। इस अध्याय के अंत में कृष्ण हमें सच्ची भक्ति कि शक्ति का स्मरण कराते हैं और बताते हैं की हम कैसे भगवन के साथ जुड़ कर इन गुणों को पार कर सकते हैं।","verseCount":27,"artwork":"assets/chapters/chapter_14.jpg"},{"number":15,"sanskritName":"पुरुषोत्तमयोग","englishName":"Purushottama Yoga","summaryEn":"Using the image of an inverted tree, Krishna describes conditioned existence and the need to loosen its attachments. The chapter turns toward the supreme person who sustains both the changing and the enduring.","summaryHi":"भगवद गीता का पंद्रहवा अध्याय पुरुषोत्तमयोग है। संस्कृत में, पुरूष का मतलब सर्वव्यापी भगवान है, और पुरुषोत्तम का मतलब है ईश्वर का कालातीत और पारस्परिक पहलू। कृष्णा बताते हैं कि ईश्वर के इस महान ज्ञान का उद्देश्य भौतिक संसार के बंधन से खुद को अलग करना है और कृष्ण को सर्वोच्च दिव्य व्यक्तित्व के रूप में समझना है, जो विश्व के शाश्वत नियंत्रक और निर्वाहक हैं। जो इस परम सत्य को समझता है वह प्रभु को समर्पण करता है और उनकी भक्ति सेवा में संलग्न हो जाता है।","verseCount":20,"artwork":"assets/chapters/chapter_15.jpg"},{"number":16,"sanskritName":"दैवासुरसम्पद्विभागयोग","englishName":"Daivasura Sampad Vibhaga Yoga","summaryEn":"Krishna contrasts qualities that support clarity and freedom with those that lead toward confusion and harm. The chapter offers a direct framework for ethical self-examination.","summaryHi":"भगवद गीता का सोलहवा अध्याय दैवासुरसम्पद्विभागयोग है। इस अध्याय में, कृष्ण स्पष्ट रूप से मानवों की दो प्रकार की प्रकृतियों का वर्णन करते हैं- दैवीय और दानवीय। दानवीय स्वभाव वाले लोग स्वयं को लालसा और अज्ञान के तरीकों से जोड़ते हैं, शास्त्रों के नियमों का पालन नहीं करते हैं और भौतिक विचारों को ग्रहण करते हैं। ये लोग निचली जातियों में जन्म लेते हैं और भौतिक बंधनों में और भी बंध जाते हैं। परन्तु जो लोग दैवीय स्वभाव वाले होते हैं, वे शास्त्रों के निर्देशों का पालन करते हैं, अच्छे काम करते हैं और आध्यात्मिक प्रथाओं के माध्यम से मन को शुद्ध करते हैं। इससे दैवीय गुणों में वृद्धि होती है और वे अंततः आध्यात्मिक प्राप्ति प्राप्त करते हैं।","verseCount":24,"artwork":"assets/chapters/chapter_16.jpg"},{"number":17,"sanskritName":"श्रद्धात्रयविभागयोग","englishName":"Sraddhatraya Vibhaga Yoga","summaryEn":"Faith takes different forms according to the three gunas. Krishna traces these differences through worship, food, discipline, speech, and giving, showing how intention shapes practice.","summaryHi":"भगवद गीता का सत्रहवा अध्याय श्रद्धात्रयविभागयोग है। इस अध्याय में, कृष्ण भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से संबंधित तीन प्रकार के विश्वासों का वर्णन करते हैं। भगवान कृष्ण आगे बताते हैं कि यह विश्वास की प्रकृति है जो जीवन की गुणवत्ता और जीवित संस्थाओं के चरित्र को निर्धारित करती है। जो लोग लालसा और अज्ञानता में विश्वास रखते हैं, वे ऐसे कार्य करते हैं जो कि अस्थायी और भौतिक फल देते हैं परन्तु जो लोग अच्छाई में विश्वास रखते हैं वे शास्त्रपूर्ण निर्देशों के अनुसार कार्य करते हैं और इसलिए उन्हें स्थायी और अधिक प्रवीण फल प्राप्त होते हैं जो मन को और भी शुद्ध करते हैं।","verseCount":28,"artwork":"assets/chapters/chapter_17.jpg"},{"number":18,"sanskritName":"मोक्षसंन्यासयोग","englishName":"Moksha Sanyaas Yoga","summaryEn":"Krishna brings together the Gita’s teaching on action, knowledge, devotion, duty, and renunciation. His final counsel leaves Arjuna with the responsibility to understand and choose.","summaryHi":"भगवद गीता का अठारहवा अध्याय मोक्षसन्यासयोग है। अर्जुन कृष्ण से अनुरोध करते हैं कि वे संन्यास और त्याग के बीच अंतर को समझाने की कृपा करें। कृष्ण बताते हैं कि एक संन्यासी वह है जो आध्यात्मिक अनुशासन का अभ्यास करने के लिए परिवार और समाज को त्याग देता है जबकि एक त्यागी वह है जो अपने कर्मों के फलों कि चिंता करे बिना भगवन को समर्पित करके कर्म करता रहता है। कृष्ण बताते हैं कि त्याग संन्यास से श्रेष्ठ है। फिर कृष्णा भौतिक संसार के तीन प्रकार के गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं। कृष्णा घोषणा करते हैं कि परमात्मा की शुद्ध एवं सत्य भक्ति ही आध्यात्मिकता का उच्चतम मार्ग है। अगर हम हर क्षण उनका स्मरण करते रहें, उनका नाम जपते रहें, अपना सर्वस्व उनको समर्पित कर दें, उन्हें ही अपना सर्वोच्च लक्ष्य बना लें तो उनकी कृपा से हम निश्चित रूप से सभी बाधाओं और कठिनाइओं को दूर कर पाएंगे और इस जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो पाएंगे।","verseCount":78,"artwork":"assets/chapters/chapter_18.jpg"}],"readingPaths":[{"id":1,"name":"Anxiety and a Steady Mind","description":"Seven verses on responding to uncertainty and pressure with steadier action.","icon":"wind","verseIds":["2.14","2.47","2.48","2.50","2.56","6.5","18.66"]},{"id":2,"name":"Purpose, Duty, and Action","description":"Seven verses on duty, right action, service, and surrender.","icon":"path","verseIds":["2.7","2.31","3.8","3.19","3.30","18.47","18.66"]},{"id":3,"name":"Devotion in Daily Life","description":"Six verses on devotion, humility, remembrance, and a steady mind.","icon":"heart","verseIds":["9.22","9.26","12.13","12.14","18.65","18.66"]}]}
